वो भयानक रात और हम दोनों

नमस्कार दोस्तों ! तो लीजिये आज आपके समक्ष पुनः उपस्थित हूँ एक और सच्ची और हॉरर कहानी लेकर।


हमारी तैयारियां 
ये कहानी भी मेरी अपने जीवन की है।   ये बात 1992 -1993  की है।  मैं अपने स्कूल की तरफ से स्काउट्स एवं गाइड्स में सेलेक्ट हुवा था और उसके लिए मुझे अपनी जूनियर टीम के साथ मिलकर किसी दूसरे नगर में स्काउट्स एवं गाइड्स की एक परेड में जाना था। 

और उसके लिए मुझे जाने से पहले अपनी टीम से  सारी बातें, परेड की योजना ,आदि इन सारी बातों पर विचार विमर्श करना था। उस दौर में मोबाइल तो था नहीं जो की आपस में फ़ोन करके विचार विमर्श कर लेते इसलिए स्कूल में ही योजना बन गयी थी की कब और कहाँ मिलना है। और हम सभी साथी लोग बड़े उत्साहित थे। 

परन्तु ठीक दो दिन पहले ही मुझे पता चला कि परेड अब निर्धारित समय एक दिन पहले ही होगी। और हम तीनो ( मैं , केदार और अमजद ) को वहाँ  समय पर पहुंचना है।  मैंने अमजद और केदार से पूछा भी था कि कौन से वाले मास्टर जी ने हमें एक दिन पहले पहुंचने को बोला है तो दोनों ने रावत गुरु जी का नाम ले लिया।  रावत गुरु जी -सबसे खतरनाक गुरु जी , जिनकी नाक पर हमेशा गुस्सा रहता था, क्योंकि उनसे ही बच्चों को सबसे ज्यादा मार पड़ती थी।

अतः बिना कोई सवाल किये मैंने तुरंत हामी भर दी कि ठीक है, हम फिर तय दिन से एक दिन पहले ही परेड वाले नगर चले जायेंगे। घर पर मैंने और बाकी दोनों ने भी अपने माता-पिता को बोल दिया है कि हम एक दिन पहले ही परेड नगर चले जायेंगे।  उनसे जरुरत के कुछ पैसे मांगे और चल दिए अपने सफर कि तरफ। 

जब चले थे एक अनजान सफर की ओर 
हमने अपने बस स्टॉप से बस पकड़ी और चल पड़े एक नए आनंद की  ओर।  तीनो दोस्तों ने अपनी-अपनी खिड़की पकड़ ली बस में, और खिड़की से आने वाली हवा से बातें करते हुए मानों हम लोग अपने-अपने स्वप्नों की दुनिया में खो गए।  खिड़की से कभी-कभी अपने सर को बाहर निकालकर आपस में ही मस्ती करते रहते।  सबसे आगे वाली खिड़की पर अमजद बैठा था जो कि अपनी शरारतों से बाज नहीं आ रहा था। 

आगे कि खिड़की से थूक कि चंद बूंदों को वह सीधे जमीन से भिड़ाना चाहता था परन्तु  बस कि तेज रफ़्तार कि वजह से उसका वह लक्ष्य को भेदने वाला थूक केदार और मेरे चेहरे पर उड़कर गिर रहा था।  इसके लिए हमने कई बार उसे डांटा भी पर अमजद है कि लक्ष्य को भेदने का दृढ़ निश्चय कर चुका था।  बड़ी मुश्किल से एक अंकल के बोलने पर वह माना।  बाद में परेड नगर में उतरकर हम दोनों ने उसे खूब धोया। 

शाम हो चली थी।  परेड नगर पहुंचने में अभी लगभग 10 -15  मिनट बचे थे कि अचानक याद आया कि रात को रुकेंगे कहाँ?  हे भगवान् ! ये क्या?  इसके बारे में तो हमने जरा भी नहीं सोचा।  शायद इसी को बालक बुद्धि कहते हैं।  ये सारी बातें हमने , यहां तक कि मैंने भी नहीं सोची कि जब उतरेंगे तो रात को डेरा कहाँ जमाएंगे ? 

मैंने जोर से पूछा "अबे आ तो गएँ हैं पर रात को रुकेंगे कहाँ ? यहां तो मेरा कोई जानने वाला भी  नहीं है जिसके वहाँ हम रुक सकें।  अमजद एवं केदार दोनों मुझ पर हंस रहे थे।  मेरी तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि आखिर ये चल क्या रहा है ? ये दोनों हंस क्यों रहे हैं ? मैंने पूछा " अबे तुम दोनों हंस क्यों रहे हो ?" तो केदार बोला  "यार यहां एक दिन पहले आने का प्लान इस अमजद का था "।  मगर क्यों ? मैंने पूछा।  तो बोला "यार इसको इसकी गर्लफ्रेंड से मिलना था। और ये कल दिन भर उसके साथ घूमेगा ? 

गर्लफ्रेंड ? तो मैंने कहॉं, तो मुझे क्यों साथ में लाये यार ? और कल गर्लफ्रेंड के साथ घूमेगा का क्या मतलब ? परेड में नहीं जाना है क्या ? मत भूलो कि कल ही परेड है ?और तू केदार ? तू क्यों आया इसके चक्कर में ? अब मेरी समझ में आया तुम दोनों ने मुझ से झूठ बोला।   तुम दोनों को मैं देख लूंगा। रावत गुरु जी का पता है न तुम्हे ? जब उन्हें पता चलेगा कि हम झूठ बोलकर यहां एक दिन पहले ही आ गए हैं तो भाई समझ लो हमारी हड्डी-पसली टूट गयी। 

अँधेरी रात में रहने का ठिकाना नहीं मिला 
यह कहता हुआ मैं उन दोनों को छोड़कर , गुस्से में वहाँ  से निकल गया।  पर थोड़ी दूर चलकर याद आया कि मैं रहूँगा कहॉं ? इसलिए फिर वापस आ गया।  वे दोनों मुझे जाता हुआ देख कर हंस रहे थे जैसे उन्हें पता था कि मैं वापस आऊंगा और हुआ भी वही।  पास आकर मैं जोर से चिल्लाया " अबे ले तो आये हो यहां अब रुकेंगे कहा? अमजद बोला "फिकर नॉट " यहां मेरी खाला रहती हैं हम वहीँ जा रहे हैं और रात को वहीँ रहेंगे।  खाला का अर्थ "मौसी" होता है . इसका अर्थ, सच में जीवन में मुझे पहली बार उसी समय पता चला।  चलो यहां आकर कुछ नया तो सीखा ,यही सोच हम खाला के घर कि तरफ बढ़ गए। 

खाला के घर का दरवाजा खटखटाया तो खाला ने दरवाज़ा खोला।  अमज़द को सामने पाकर पहले तो वो आश्चर्यचकित हुई और खुश भी परन्तु दो नए चेहरों को देखकर उनकी वो ख़ुशी की  चमक फीके हो गयी।  "ये दोनों कौन हैं ?" ये मेरे दोस्त हैं और आज रात हम यही रुकेंगे और कल हमारी पुलिस ग्राउंड में स्काउट्स गाइड्स की  परेड है तो ये दोनों भी उसी में हिस्सा लेने के लिए यहां आये हुए हैं । 

वहाँ अमज़द खाला से बात कर रहा था तो मेरी एवं केदार कि नजर उस 10 x 10 के एक मात्र कमरे पर पड़ी जिसमे ज़मीन पर एक बिस्तर लगा हुवा था और साइड में किचन का सेट अप किया हुआ था।  एक स्टोव ,पानी की बाल्टी एवं बर्तन भांडे और ऊपर से खाला के 5 बच्चे, खुद खाला और उनके शौहर मिलाकर कमरे को पूर्ण रूप से भर रहे थे। बड़ी मुश्किल से एक अतिरिक्त आदमी कि जगह वह भी दरवाजे के पास दिख रही थी जो कि दरवाज़ा बंद करने के बाद ही बन पा रही थी। 

मैंने और केदार ने एक दूसरे को देखा और आँखों ही आँखों में बातें की और निर्णय लिया की यहां से कहीं और चलते हैं क्योंकि यहां तो अपनी दाल नहीं गलने वाली।  केदार बोला  "अमज़द एक काम कर, तू यहीं रुक जा खाला के पास हम दोनों कहीं ओर चलते हैं। 

कल मिलेंगे परेड ग्राउंड पर, अगर तू आएगा तो?  अमज़द बोला "पर तुम रहोगे कहाँ ? केदार बोला - ' यहां एक अंकल जी को मैं जानता हूँ जो पहले हमारे पड़ौसी हुआ करते थे।  उनका घर मुझे पता है यहां कहॉं है।  हम दोनों वहाँ चले जाते हैं ? काफी बहसा-बहसी करने के बाद अमज़द मान गया और हम वहाँ से निकल गए।   

जब उम्मीद भी साथ छोड़ दे 
बाहर आकर मैंने केदार से कहा " भाई कोई अंकल हैं भी या ऐसे ही बोल के आ गया ? वह बोला- "हाँ यार, हैं अंकल जी , चल उनके घर चलते हैं" खाला के घर से निकलकर यही कोई 10 मिनट हुए होंगे कि हम सुनसान सड़क के एक ऐसे किनारे पर पहुचें जहां से नीचे पूरा शहर टिमटिमाती हुई रौशनी में जगमगा रहा था। 

वहां पर केदार ने बोला यहां रोड से नीचे हैं उनका घर।  उस सुनसान रोड पर जहां पर बिजली का अता-पता भी नहीं वहाँ से नीचे झाँकने पर एक घर दिखाई तो दे रहा था पर उसकी छत ही हमें घूर रही थी और मानो बोल रही हो आ जाओ तुम्हारा ही इन्तजार था।  

वहाँ से हम घास और झाड़ियों को जैसे तैसे पकड़कर नीचे  उतरे।  संभवतः यह उनके घर में आने जाने का रास्ता नहीं था।  वह शायद कहीं और नीचे कि तरफ से था।  उनके छोटे से आँगन में पहुंचकर हम सोच रहे थे कि चलो आज का रहने का जुगाड़ हो गया पर अंदर से आती हुई दोनों अंकल-आंटी की तेज आवाज़ ने हम दोनों के पांव वहीं पर रोक लिए। 

दोनों पति-पत्नी  आपस में झगड़ रहे थे।  अंकल जी शायद शराब  पीकर झगड़ा कर रहे थे। आंटी चिल्लाई  "मेरी तो जिंदगी बर्बाद हो गयी इस बेवड़े के साथ व्याह कर" और "मुझे तो सोने का सिंहासन मिल गया तुझ से शादी करके " "जिस दिन से तुझ से शादी हुई है न, मेरा नसीब ही ख़राब चल रहा है", अंकल जी ने अपना काउंटर अटैक किया । 

उन दोनों का झगड़ा देख कर हम दोनों उलटे पांव वापस ऊपर रोड पर आ गए। रोड पर कुछ देर बैठ कर अब केदार भी अमज़द को कोस रहा था।  कुछ देर वहाँ पर बैठ कर सोचने लगे कि आगे क्या किया जाय।  क्योंकि जेब में इतने पैसे भी नहीं थे कहीं जाकर किसी होटल या गेस्ट हाउस में रात बिता लें।  अंत में एक निर्णय लिया कि चलो इस शहर के इंटरमीडिएट कॉलेज में जाकर शरण लेते हैं।  हाँ यही ठीक रहेगा और दोनों ने अपने होंठो पर विजयी मुस्कान लेते हुए कदम आगे बड़ा दिए। 

भगवान् भरोसे था सब 
आगे चलकर खाने के लिए एक दर्जन केले खरीद लिए (भगवान् का शुक्र था कि लास्ट दुकान खुली थी और वह भी  शटर बंद करने ही वाला था।)  4-5 मोमबत्ती लेकर हम चल दिए वहाँ से लगभग 1 से डेढ़ किलोमीटर नीचे इंटरमीडिएट कॉलेज कि तरफ। खैर कहीं पर आराम से और कहीं पर दौड़ लगाकर हम पहुंच ही गए अपनी मंजिल पर। 

वहाँ पहुंच कर भी हमें निराशा ही लगी क्योंकि कॉलेज का मुख्य प्रवेश द्वार बंद था।  अब अंदर कैसे जाएँ ? हमने गेट को बहुत खटखटाया पर अंदर से कोई  हलचल या आवाज़ नहीं आयी।  अंततः दोनों ने निर्णय लिया कि अब मुख्य प्रवेश द्वार को टाप कर (अर्थार्थ द्वार को फांद कर ) ही अंदर जायेंगे।  लो जी  फांद कर अंदर भी पहुंच गए।  कॉलेज में भी लगभग अँधेरा ही था।  पर आस पास के मकानों से आती हुई रौशनी से रास्ता दिखाई दे रहा था तो ज्यादा मुश्किल नहीं हुई।  

आगे चलकर किसी कमरे की खिड़की से रौशनी आती हुई दिखाई दी तो उम्मीद की किरण ने फिर से अंगड़ाई ली और चल पड़े खिड़की की तरफ।  खिड़की से झाँका तो एक आदमी अंदर खर्राटे ले कर बड़ी आराम की नींद फरमा रहा था।  हम मन ही मन सोचने लगे कि कैसा आदमी है यार ? यहां दो छोटे बच्चे रात को लावारिसों की तरह भटक रहें हैं और ये बड़े आराम से खर्राटे मारकर सो रहा है।  इसे जरा भी दया नहीं आते हम बच्चों पर ? पर फिर अगले पल सोचा "इसमें इसकी क्या गलती है? जो हम इस पर अपना गुस्सा निकाल रहे हैं। 

अंकल ! अंकल ! अंकल ! पर मजाल जो अंकल जी अपने उस करवट से इस करवट बदले हो ? अंकल जी ! अंकल जी ! अंकल जी !।  पर अंकल जी ने तो कसम खाई थी की मैंने आज उठना ही नहीं है तुम दोनों की मदद के लिए।  अंकल! अंकल ! पर नहीं , कुछ भी हरकत नहीं।  फिर मेरे खुराफाती दिमाग में एक माइंड ब्लोइंग आईडिया ने जन्म लिया।  क्यों ने एक पत्थर इसकी खिड़की  पर मार दिया जाय।  तब तो उठेगा ये गैंडा ? मैं अभी सोच ही रहा था केदार तो पत्थर उठाकर खिड़की की तरफ 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चला भी चुका था ।  भड़ाक !! जोर की आवाज़ से खिड़की के दरवाजे हिल गए।

कांच टूटने की आवाज़ नहीं आयी क्योंकि खिड़की पर कांच ही नहीं थे। पर अंदर से कोई हरकत नहीं . भड़ाक ! भड़ाक ! भड़ाक ! तीन पत्थर और मारे गए पर अंकल जी ? बाप रे ! ये आदमी न जाने कितने जन्मो की नींद पूरी कर रहा था।  उठा ही नहीं।  अब हमे ये लगा की कहीं ये आदमी यहां मरा हुवा तो नहीं पड़ा है ? ये सोच के हम दोनों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी और हम डर के मारे वहाँ से आगे की तरफ भाग गए। 

रात के सन्नाटे में जब उम्मीद दिखी 
आगे की तरफ आने पर एक रास्ता ऊपर की ओर जा रहा था।  हम उसी पे हो लिए।  वह रास्ता हमें कक्षा 12 (B) के कमरे के दरवाजे तक ले गया। केदार बोला यहां आकर क्या करें यार ? कक्षा 12 (B) में विज्ञान पढ़ें?? या फिर यहीं पर सो जाएँ ज़मीन पर ? मैंने कहा "विज्ञान पढ़ते हैं"।  "क्या"? "क्या बकवास कर रहा है तू ?"।  मैंने कहा बकवास नहीं कर रहा हूँ , वो देख सामने दरवाजे पर। 

और दरवाजे पर नजर पड़ते ही दोनों की आखें बिल्ली मौसी की तरह चमक गयी।  कक्षा 12 (B) के  दरवाजे का एक पल्ले का ठीक बीच वाला हिस्सा छेद नुमा आकृति में टूटा हुवा था।  जहां से हम दोनों आसानी से कक्षा के अंदर घुस सकते थे। और फिर देखना या सोचना क्या था .दोनों पलक झपकते ही गोली की रफ़्तार के साथ उस छेद से कक्षा के अंदर घुस गए।  मगर अंदर काफी अँधेरा था पर साथ में लायी गयी मोमबत्तियां यहां काम आ गयी। 

कक्षा के अंदर घुसते ही सबसे पहले मोमबत्ती को उसकी सही जगह बताई ताकि वह हमें रात में रौशनी दे सके और हम रात को आसानी से काट सकें।  उसके बाद कवायद शुरू हुई एक ऐसी जगह ढूंढ़ने की जहां हम रात को आराम से सो सके। उसके लिए पूरी कक्षा का एक चक्कर लगाया।  शायद अपनी कक्षा में भी हम इतना कभी घूमे हों जितना आज की रात घूमे 

खैर भगवान् ने हमारी सुन ली और हमने बैठने वाले लम्बे बेंच को उसी के लम्बे मेज (टेबल) से सटा कर चिपका दिया ताकि एक सेल्टर नुमा जगह बन जाय और हम उसके नीचे अपना शाही आराम फरमा सकें।  हमने केले खाये और पानी पीकर अपनी-अपनी जगह सो गए। कुछ देर तक गप्पे हांकने और अमज़द को कोसने के बाद दोनों को नींद ने अपनी आगोश में ले लिया और हमें पता ही नहीं चला कि कब हमें नींद आ गयी। 

रात के साये ने जब आवाज़ लगायी 
सोने के कुछ देर बाद से ही ऊपर एक पड़ौसी के कुत्ते ने भौंक-भौंक कर नींद हराम कर रखी थी।  पर उसको नजर अंदाज़ करके फिर भी हम जैसे तैसे सो गए ।  शायद रात 2 बजे का समय होगा कि मेरी नींद किसी आवाज़ से खुल गयी।  कोई मुझे मेरे नाम से पुकार कर बुला रहा था ।  मुझे लगा कि शायद मैं कोई सपना देख रहा हूँ इसलिए ये सब हो रहा है और फिर से सो गया। 

पर कुछ देर बाद मुझे "केदार ओ केदार " "यहां  आ जाओ न यहां बहुत जगह है सोने के लिए"।  यह सब सुनने के बाद तो मुझे पक्का यकीन हो गया कि ये मेरा सपना नहीं है और ये सच में कोई पुकार रहा है। कमरे की मोमबत्ती भी न जाने कब की बुझ चुकी थी और कुत्ते के भौंकने कि आवाज़ भी नहीं थी तो शायद ये वाली आवाज़ मुझे साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थी। 

मैंने चुपके से केदार को जगाया और उसी पूरी बात बताई।  वह नींद में ही बोला "छोड़ न यार सोने दे , तूने कोई सपना देखा होगा "।  "अरे मैंने सपना नहीं देखा" मैं ये आवाज़ दो बार सुन चुका हूँ"।  "उठ न यार"  "मुझे कुछ गड़बड़ लग रही है । उठ न यार 


केदार बोला "यार न तो तू खुद सो रहा है और न ही...........अभी वो अपनी बात पूरी कर भी नहीं पाया था कि फिर से आवाज़ आयी " लक्ष्मण ! ओ  लक्ष्मण ! केदार ! ओ केदार ! "कितनी बार आवाज़ लगाएं" ? "यहां ऊपर आ जाओ " यहां काफी जगह है"।  हम दोनों को जैसे ठंडी हवा ने जकड लिया हो।  डर के मारे हाँथ पांव कांपने लगे।  हम दोनों चुप रहे और कोई भी प्रतिक्रया नहीं दी। 

परन्तु फिर से "आवाज़"  ने हमारे हलक को सुखा दिया।  अबकी बार आवाज़ आयी "अरे डरो नहीं हम भी तुम्हारी तरह स्काउट्स गाइड्स में भाग लेने यहां एक दिन पहले ही पहुंच गएँ थे और हमें भी कहीं रहने कि जगह नहीं मिली तो हम भी यहीं इसी कॉलेज में आ गए।"  "डरो नहीं ,आ जाओ यहां ऊपर केमिस्ट्री प्रयोगशाला है।"  "यहाँ चले आओ।"  "यहां काफी जगह है "। 

क्या वाकई में यह भूत था 
स्काउट्स गाइड्स कि बात सुनकर हम दोनों में थोड़ा हिम्मत आयी और मैंने जबाब दिया नहीं भैया हमें बहुत नींद आ रही है" और अब तो सुबह होने में कुछ ही घंटे बाकी हैं तो कोई बात नहीं , जहां इतनी रात काट ली वहाँ कुछ घंटे और।

केदार ने पूछा "चलें क्या" ? "मैंने कहा तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या" ? पता नहीं कौन हैं ? "सो जा न यार वैसे भी कुछ ही घंटे बचे हैं सुबह होने में।"  और शायद मैं इसलिए ऐसा बोल पाया कि मैं थोड़ा आलसी  प्रकार का लड़का था और शायद उसी आलस में मेरा मन कहीं भी जाने को नहीं रहा होगा इसलिए मैंने मना कर दिया।  और मेरे मना करने के बाद केदार भी मान गया।  आवाज़ें लगातार आती रहीं पर हमने कानो में अपने-अपने रुमाल के हिस्से ठूस दिए थे ताकि नींद खराब न हो। 

और फिर हमें दुबारा कब नींद आ गयी हमें पता भी नहीं चला। सुबह जब हमारी नींद खुली तो कॉलेज में कुछ बच्चे आ चुके थे।  उनके आवाज़ और चिड़ियों की  चहचहाट से हमारी नींद खुली थी।  दोनों उठे और पास के नल से हाथ मुँह धोने लगे।  स्कूल में आये हुए बच्चे हमें ऐसे घूर रहे थे जैसे हम इस दुनिया के नहीं बल्कि कहीं और से आये हों।  खैर फटाफट फ्रेश होने के बाद हमें जाना था पुलिस ग्राउंड जहां हमारी परेड होनी थी। 

परेड ग्राउंड जाने से पहले हमे चाहिए था कुछ खाने को क्योंकि रात के केलों ने अपनी जिम्मेदारी अब छोड़ थी इसलिए कुछ नया फ्रेश चाहिए था ।  सामने एक आदमी दिखाई दिया तो सोचा चलो इसी से पूछ लेते हैं कि चाय कि टपरी वगैरह कोई हो तो बता देगा।  नजदीक जाने पर पता चला कि ये वही रात वाले अंकल हैं जो न जाने कितने जन्मों से सोये हुए पड़े थे। उन्हें ज़िंदा देखकर हमें ख़ुशी हुई.

हमने उन्हें रात की पूरी कहानी बताई (कक्षा 12-B में सोने तक की)।  फिर जब हमने उन्हें केमिस्ट्री लैब से आने वाली आवाज़ एवं वहाँ  रुके हुए लड़कों  की बात बताई तो तो उसकी आखें फटी की फटी रह गयी।  वह हमें बड़े अजीब नजरों से देखने लगा और यहां तक की अगल-बगल में जो कोई और भी था सब हमें घूर के देखने लगे।  हमें लगा हमने शायद कुछ गलत बोल दिया। 

आवाज़ का रहस्य 
हमने कहा अंकल "ऐसी क्या बात हो गयी आप सब लोग ऐसे क्यों देख रहे हैं" ? हमने कुछ गलत बोल दिया क्या ? "अरे बेटा गलत नहीं बोला " हम तो ये सोच रहें हैं कि तुम दोनों इतने छोटे होने के बावजूद भी ऐसी हालत में सकुशल हो" इससे पहले कि हम कुछ समझ पाते, साथ वाले दूसरे आदमी ने बोला "बेटा जो आवाज़ें तुमने रात को सुनी थी वो वहाँ अक्सर आती हैं" और वह "निरुपम नाम के एक लड़के की है।" 

जो आज से लगभग 6 साल पहले लैब में एक्सीडेंटली जल कर ख़त्म हो गया था और आज भी उसकी आत्मा उसी लैब में भटकती है।"  पहले तो वह आस पास के मकानों में रहने वालो लोगो को सुनाई देता था पर अब वह स्कूल में कभी कभी बच्चों को भी परेशान करता है"। 

"परन्तु तुम दोनों तो यहां रात को रुके हो और वो भी ठीक उस लैब के नीचे कक्षा 12  (B) में"। "बेटा ये किसी चमत्कार से कम नहीं है कि तुम दोनों ज़िंदा हो"।  वरना  वहाँ रात में रुकने वाला तो निश्चित ही मारा जाता" और वैसे भी वह लैब पिछले 6 सालों से बंद ही पड़ी है।  वहाँ कोई आता जाता नहीं है ।  बच्चों की हद भी केवल कक्षा 12 (B) तक ही है।  वहाँ ऊपर कोई नहीं जाता।  तुम लोगो ने शायद लैब को जाने वाले रास्ते के गेट को नहीं देखा है, उसपे इतना बड़ा ताला लगा हुवा है और रास्ते पर कंटीली झाड़ियाँ उगी हैं। 

हम दोनों ने ये सब सुना तो हवा फिर से टाइट हो गयी और अब तो मन कर रहा था की इस स्कूल से जल्दी से बाहर निकल जाएँ | आगे चलते चलते  हम दोनों एक दूसरे को देखने लगे और मन ही मन सोचने लगे कि क्या वाकई में ये सच है कि हमने किसी आत्मा से वार्तालाप  किया और उसका उत्तर हाँ या ना में दिया?  उसके बाद हम दोनों वहाँ  से जल्दी  से निकलकर चाय नाश्ता करने चल दिए। 

तदुपरांत परेड ग्राउंड में परेड करने चले गए।  पर उस दिन से हम दोनों भूत प्रेत के बारे में सोचने लगे और अक्सर उनकी बातें करने लगे।  खासकर हमारे साथ घटित हुई ये घटना जब हमने अपने साथियों को सुनाई तो किसी को भी विश्वाश नहीं हुआ।  खैर हमें इससे क्या लेना था हमें पता था कि हमारे साथ क्या हुवा था। । 

कहानी का सार -
इस कहानी का सार भी अन्य हॉन्टेड कहानियों की ही तरह है।  जिसको विश्वाश कर इसे स्वीकारना है वो कर सकता है वरना  जिसे यह अन्धविश्वाश लगता है वह अपनी बारी का इन्तजार करे। 

आपके कमैंट्स एवं रिप्लाई कि प्रतीक्षा में  .

मेरी कहानियां

मैं एक बहुत ही साधारण किस्म का लेखक हूँ जो अपनी अंतरात्मा से निकली हुई आवाज़ को शब्दों के माध्यम से आप तक पहुँचाता हूँ

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